Wednesday, January 20, 2016

HINDU PHILOSOPHY (8) हिंदु दर्शन

Palmist, numerologist, Vastu specialist, marriage-love counsellor. HINDU PHILOSOPHY (8) हिंदु दर्शन 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  
By :: Pt. Santosh Bhardwaj dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com 
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ब्रह्मा जी के प्राकट्य के साथ उन्हें भगवान् श्री हरी विष्णु ने वेदों का उपदेश दिया। यह ज्ञान गँगा नारद आदि ऋषियों के माध्यम से एक कल्प से दूसरे कल्प, एक पीढ़ी से दुसरी पीढ़ी तक निरंतर अनवरत चलती चली आ रही है।  समय कल के अनुरूप मनीषियों ने पुराण, उपनिषद आदि की रचना जन कल्याण के लिए की। हर ग्रन्थ के भाष्य, विवेचनाएँ लिखी-की गईं। मनीषियों विद्वानों के द्वारा तत्त्वों के अन्वेषण की प्रवृत्ति तभी से चली आ रही है और विचारों में द्विविध प्रवृत्ति और द्विविध लक्ष्य के दर्शन होते हैं। प्रथम प्रवृत्ति प्रतिभा या प्रज्ञामूलक है तथा द्वितीय प्रवृत्ति तर्क मूलक है। 
प्रज्ञा के बल से ही पहली प्रवृत्ति तत्त्वों के विवेचन में कृत कार्य होती है और दूसरी प्रवृत्ति तर्क के सहारे तत्त्वों के समीक्षण में समर्थ होती है। ज्ञान का उपयोग लक्ष्य निर्धारण और अर्जन-धनोपार्जन तथा ब्रह्म का साक्षात्कामोक्ष रहा है। 
प्रज्ञा (-बुद्धि, विवेक, ज्ञान, समझ, Intellect, Intelligence, Knowledge, Understanding, Wisdom, Prudence) मूलक और तर्क-मूलक (-logic, argument, contention) प्रवृत्तियों के परस्पर सम्मिलन से आत्मज्ञान-परमात्मतत्व, परमात्मज्ञान, तत्त्वज्ञान का आविर्भाव हुआ। उपनिषदों के ज्ञान का संतुलित उपयोग-प्रयोग आत्मा और परमात्मा के एकीकरण को सिद्ध करने वाले प्रतिभामूलक वेदान्त में हुआ। प्रज्ञा-ज्ञान वह चैतसिक प्रकाश है जिसके द्वारा किसी वस्तु के विषय में जानकारी प्राप्त की जाती है।
मनीषियों ने कर्म, ज्ञान और भक्तिमय त्रिपथ का उपदेश मनुष्य के कल्याण हेतु किया ताकि उसका कल्मष दूर करके उसे पवित्र, नित्य-शुद्ध-बुद्ध और सदा स्वच्छ बनाकर उसका आध्यात्मिक विकास किया जा सके। यह पतित पावनी ज्ञान की धारा दर्शन कहलाती है। Philosophy is a combination of two words :- Phila (-फिलास, प्रेम), love, one or ones attracted to or living or growing by preference; Sophia (-सोफिया, ज्ञान) wisdom। 
दर्शन ::  दर्शन शब्द दृश् धातु से बना है, जिसका अर्थ है, जिसके द्वारा देखा जाए।  भारत मे दर्शन उस विद्या को कहा जाता है जिसके द्वारा तत्व का साक्षात्कार हो सके। भारत का दार्शनिक केवल तत्व की बौधिक व्याख्या से ही संतुष्ट नही हो पाता , बल्कि वह तत्व की अनुभूति पाना चाहता है .दर्शन का अर्थ है देखना। मनुष्य का दृष्टिकोण क्या है, कैसे है, किसलिए है, किस कारण है, क्यों है, किसके लिए है, इसके परिणाम क्या होंगे इन सब प्रश्नों का समाधान ढूँढता है दर्शन शास्त्र। इस व्यक्ति के मत, राय का निर्धारण भी करता है।  
आचार्य पाणिनी ने धात्वर्थ में प्रेक्षण शब्द का प्रयोग किया है। प्रकृष्ट ईक्षण, जिसमें अन्तश्चक्षुओं द्वारा देखना या मनन करके सोपपत्तिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है। इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नाम दर्शन है। जहाँ पर इन सिद्धान्तों का संकलन हो, उन ग्रन्थों का भी नाम दर्शन ही होगा, यथा : न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन मीमांसा दर्शन आदि-आदि।
दर्शन ग्रन्थों को दर्शन शास्त्र भी कहते हैं। यह शास्त्र शब्द शासु अनुशिष्टौ से निष्पन्न होने के कारण दर्शन का अनुशासन या उपदेश करने के कारण ही दर्शन-शास्त्र कहलाने का अधिकारी है। दर्शन अर्थात् साक्षात्कृत धर्मा ऋषियों के उपदेशक ग्रन्थों का नाम ही दर्शन शास्त्र है।
दर्शन की प्रकृति :- दर्शन एक जीवन दृष्टी पद्धति शैली है, जीवन, जगत और आध्यात्म को जानने की इच्छा। दर्शन शब्द दृश धातु से बना है अर्थात जिसके द्वारा देखा जाये। यह वह विद्या है जिससे तत्व ज्ञान-परमात्मतत्व की प्राप्ति हो सके। यह  (1). ऐन्द्रिक (-sensual) और (2). अनेंद्रिक  (-unsensual)। दर्शन एक जीवन दृष्टी है, जीवन, जगत और आध्यात्म को जानने की। 
अनैन्द्रीय-अनेंद्रिकअनुभूति ही आध्यत्मिक अनुभूति है और इसके द्वारा ही तत्व का साक्षात्कार संभव है। आध्यत्मिक अनुभूति (-intuitive experience) बौधिक ज्ञान से उच्च है। बौधिक ज्ञान में ज्ञेय और ज्ञाता के बीच द्वैत विद्यमान रहता है, परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान में ज्ञेय और ज्ञाता के का भेद नष्ट हो जाता है।
एषा तेSभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रुणु। बुद्धया युक्तो यथा पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥ [श्रीमद्भगवद्गीता 2-39] :: हे अर्जुन! यह बुध्दि (-ज्ञान) जो साँख्य के अनुसार मैंने तुझे कही है, अब यही बुध्दि मैं तुझे योग के अनुसार कहूँगा जिसके ज्ञान से तू कर्म-बन्धन को नष्ट कर सकेगा।
 ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविषै: पृथक्। ब्रह्यसूत्रपवैश्चैव हेतुमदिभर्विनिधैश्चितै:॥ [श्रीमद्भगवद्गीता 13-4] :: इस क्षेत्र-शरीर और क्षेत्रज्ञ-आत्मतत्वों के विषय में ऋषियों ने वेदों ने विविध भाँति से समझाया है। इन्ही के विषय में ब्रह्यसूत्रों में पृथक्-पृथक् (-शरीर जीवात्मा और परमात्मा के विषय में) युक्तियुक्त ढंग से (तर्क से) कथन किया है।
मुख्यत: योग-क्रियाओं का लक्ष्य है बुतद्ध को विकास देना। यह कहा है कि बुध्दि के विकास का अन्तिम रूप है :: ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा॥ 
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥ :: योग से प्राप्त बुध्दि से ऋतंभरा कहते है और इन्द्रियों से प्रत्यक्ष तथा अनुमान से होने वाला ज्ञान सामान्य बुध्दि से भिन्न विषय अर्थ वाला हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि जो ज्ञान सामान्य बुध्दि से प्राप्त होता है वह भिन्न है और ऋतंभरा योग से सिद्ध हुई बुध्दि से प्राप्त ज्ञान भिन्न अर्थ वाला हो जाता है। इससे ही अध्यात्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
मनुष्य की बौद्धिकता उसे अन्यानेक प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए बाध्य करती है यथा :: विश्व का स्वरूप क्या है ? इसकी उत्पत्ति किस प्रकार और क्यों हुई ? विश्व का कोई प्रयोजन है अथवा यह प्रयोजनहीन है ? आत्मा क्या है ? जीव क्या है ? ईश्वर है अथवा नहीं ? ईश्वर का स्वरूप क्या है ? ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण क्या है ? ज्ञान का साधन क्या है ? सत्य ज्ञान का स्वरूप और सीमाए क्या है ? शुभ और अशुभ क्या है ? उचित और अनुचित क्या है ? नैतिक निर्णय का विषय क्या है ? व्यक्ति और समाज में क्या सम्बन्ध है ? इत्यादि। दर्शन इन प्रश्नों का युक्ति-युक्त उत्तर देने का प्रयास है। इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए भावना या विश्वास का सहारा नहीं लिया गया है, अपितु बुद्धि का प्रयोग किया गया है। 
भारत जगत गुरु है। संस्कृति, इतिहास इसके साक्षी हैं। दर्शन शस्त्र मानव मूल्यों का निर्धारण-संचालन करता है। यह प्रेरणा का स्त्रोत्र भी है। वैयक्तिक जीवन के सम्मार्जन और परिष्करण में यह नितान्त-अत्यावश्यक है। इसकी उपयोगिता बहु आयामी है।आध्यात्मिक पवित्रता एवं उन्नयन, बिना दर्शन-आदर्शमानकों के अभाव में असंभव है। प्रमाण और तर्क सशोधन, मनुष्य के जीवन में मार्ग दर्शन में सहायक हैं। किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:। [श्रीमद्भगवद्गीता]  :: संसार में करणीय क्या है और अकरणीय क्या है ? इस विषय में विद्वान एक मत नहीं हैं। यहाँ भी परम लक्ष्य एवं पुरुषार्थ की प्राप्ति में दर्शन सहायक है। 
दर्शन द्वारा विषयों को हम संक्षेप में दो वर्गों में रख सकते हैं। लौकिक-अपरा-भौतिक-जड़ और अलौकिक-परा-आध्यात्मिक-चेतन। यह ज्ञात से अज्ञात, जड़ से चेतन, प्रकृति से परमात्मा की ओर ले जाने में सहायक है। 
वेद दर्शन का मूल हैं। वेद धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि सभी के मूल-प्रेरणा स्रोत हैं। कोई भी धार्मिक आयोजन, अनुष्ठान, सांस्कृतिक कृत्य वेद-मंत्रों का गायन के बगैर अधूरा है। दर्शन का आधार और प्रमाण भी वेद ही हैं। वेदों में दर्शन के अतिरिक्त जीवन शैली, काव्य, चिकित्सा, ज्योतिष, काव्य, ज्ञान-विज्ञान का समावेश है। 
वेद (-विज्ञ अर्थात ज्ञान) मनुष्य के दार्शनिक विचारों का मानव-भाषा में सबसे पहला वर्णन हैं। वे परम सत्य ईश्वर की वाणी, आस्तिक दर्शन के प्रमाण हैं। वेदों का विस्तार-प्राकट्य उपनिषदों में प्राप्त है। उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है  श्रद्धा युक्त निकट बैठना (उप + नि + षद) .उपनिषद में गुरु और शिष्य से सम्बंधित वार्तालाप हैं। उपनिषद वेदों का ही निचोड़ है इसलिए इन्हें वेदान्त (वेद+अंत) भी कहा जाता है। 
वैदिक दर्शन में षड्दर्शन अधिक प्रसिद्ध और प्राचीन हैं। गीता का कर्मवाद भी इनके समकालीन है। षडदर्शनों को आस्तिक दर्शन कहा जाता है। वे वेद की सत्ता को मानते हैं। हिन्दू दार्शनिक परम्परा में विभिन्न प्रकार के आस्तिक दर्शनों के अलावा अनीश्वरवादी और भौतिकवादी दार्शनिक परम्पराएँ भी विद्यमान रहीं हैं।
वेद को स्वीकार करने का अर्थ यह है कि आध्यात्मिक अनुभव से इन सब विषयों में शुष्क तर्क की अपेक्षा अधिक प्रकाश मिलता है। वैदिक साहित्य का विकास चार चरणों में हुआ है। ये संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् कहलाते हैं। मंत्रों और स्तुतियों के संग्रह को संहिता कहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मंत्रों की संहिताएँ ही हैं। इनकी भी अनेक शाखाएँ हैं। इन संहिताओं के मंत्र यज्ञ के अवसर पर देवताओं की स्तुति के लिए गाए जाते थे। आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक कृत्यों के अवसर पर इनका गायन होता है।
वेद मंत्रों में इंद्र, अग्नि, वरुण, सूर्य, सोम, उषा आदि देवताओं की संगीतमय स्तुतियाँ सुरक्षित हैं। यज्ञ और देवोपासना ही वैदिक धर्म का मूल रूप था। वेदों की भावना उत्तर कालीन दर्शनों के समान सन्यास प्रधान नहीं है। इनमें जीवन के प्रति आस्था तथा जीवन का उल्लास ओतप्रोत है। जगत् की असत्यता का वेदमंत्रों में आभास नहीं है। ऋग्वेद में लौकिक मूल्यों का पर्याप्त मान है। ऋषि देवताओं से अन्न, धन, संतान, स्वास्थ्य, दीर्घायु, विजय आदि की अभ्यर्थना करते हैं। ये संगीतमय लोक काव्य के उत्तम उदाहरण हैं। ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रंथों में गद्य की प्रधानता है, यद्यपि उनका यह गद्य भी लययुक्त है। ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की विधि, उनके प्रयोजन, फल आदि का विवेचन है।आरण्यक ग्रंथों में आध्यात्मिकता की ओर झुकाव दिखाई देता है। ये वानप्रस्थों के उपयोग के ग्रंथ हैं। उपनिषदों में आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता है। चारों वेदों की मंत्र संहिताओं के ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् अलग अलग मिलते हैं। शतपथ, तांडय आदि ब्राह्मण प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण हैं। ऐतरेय, तैत्तिरीय आदि के नाम से आरण्यक और उपनिषद् दोनों मिलते हैं। इनके अतिरिक्त ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य आदि प्राचीन उपनिषद् भारतीय चिंतन के आदिस्त्रोत हैं।
उपनिषदों का दर्शन आध्यात्मिक है। ब्रह्म की साधना ही उपनिषदों का मुख्य लक्ष्य है। ब्रह्म को आत्मा भी कहते हैं। आत्मा विषयजगत्, शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि आदि सभी अवगम्य तत्वों स परे एक अनिर्वचनीय और अतींद्रिय तत्व है, जो चित्स्वरूप, अनंत और आनंदमय है। 
सभी परिच्छेदों से परे होने के कारण वह अनंत है। अपरिच्छन्न और एक होने के कारण आत्मा भेद मूलक जगत् में मनुष्यों के बीच आंतरिक अभेद और अद्वैत का आधार बन सकता है। आत्मा ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। उसका साक्षात्कार करके मनुष्य मन के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। अद्वैत भाव की पूर्णता के लिए आत्मा अथवा ब्रह्म से जड़ जगत् की उत्पत्ति कैसे होती है, इसकी व्याख्या के लिए माया की अनिर्वचनीय शक्ति की कल्पना की गई है। किंतु सृष्टि वाद की अपेक्षा आत्मिक अद्वैतभाव उपनिषदों के वेदांत का अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। अद्वैतभाव भारतीय संस्कृति में ओतप्रोत है। दर्शन के क्षेत्र में उपनिषदों का यह ब्रह्मवाद आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य आदि के उत्तरकालीन वेदांत मतों का आधार बना। वेदों का अंतिम भाग होने के कारण उपनिषदों को वेदांत भी कहते हैं।
उपनिषदों का अभिमत ही आगे चलकर वेदांत का सिद्धांत और संप्रदायों का आधार बन गया। उपनिषदों की शैली सरल और गंभीर है। अनुभव के गंभीर तत्व अत्यंत सरल भाषा में उपनिषदों में व्यक्त हुए हैं। उनको समझने के लिए अनुभव का प्रकाश अपेक्षित है। ब्रह्म का अनुभव ही उपनिषदों का लक्ष्य है। वह अपनी साधना से ही प्राप्त होता है। गुरु का संपर्क उसमें अधिक सहायक होता है। तप, आचार आदि साधना की भूमिका बनाते हैं। कर्म आत्मिक अनुभव का साधक नहीं है। कर्म प्रधान वैदिक धर्म से उपनिषदों का यह मतभेद है।
सन्यास, वैराग्य, योग, तप, त्याग आदि को उपनिषदों में बहुत महत्व दिया गया है। इनमें श्रमण परंपरा के कठोर सन्यास वाद की प्रेरणा का स्रोत दिखाई देता है।  गीता का कर्म योग उपनिषदों की आध्यात्मिक भूमि में ही अंकुरित हुए हैं।
मीमांसा :-  कर्म कांड और वेदांत वेद की 2 शाखाएँ हैं। संहिता और ब्राह्मण में कर्म कांड का प्रतिपादन किया गया है तथा उपनिषद् एवं आरण्यक में ज्ञान का। मीमांसा दर्शन के आद्याचार्य जैमिनि ने इस कर्मकाण्ड को सिद्धांत बद्ध किया है। प्रतिपादित कर्मों के द्वारा ही मनुष्य अभीष्ट प्राप्त कर सकता है। 
कर्म तीन प्रकार के हैं :- काम्य, निषिद्ध और नित्य। बिना कर्म के ईश्वर भी फल देने में समर्थ नहीं है। मीमांसा दर्शन ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हुए बहुदेववादी है। सभी कर्मों के परिणाम विधाता तय करता है जो मनुष्य को शुभ और अशुभ फल उसके जन्म-जन्मांतरों के कर्मों के अनुरूप प्रारब्ध के रूप में प्रकट करता है। पूर्व अर्जित कर्म ही शुभ-अशुभ, रोग-वैराग आदि के रूप में प्रकट होते है  और फल के उपरांत नष्ट हो जाते हैं। 
षड्दर्शन :: 
(1). न्याय :: महर्षि गौतम द्वारा प्रतिपादित इस मार्ग-दर्शन में पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्व ज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। फिर अशुभ कर्मो में प्रवृत्त न होना, मोह से मुक्ति एवं दुखों से निवृत्ति होती है। इसमें परमात्मा को सृष्टि कर्ता, निराकार, सर्वव्यापक और जीवात्मा को शरीर से अलग एवं प्रकृति को अचेतन तथा सृष्टि का उपादान कारण माना गया है और स्पष्ट रूप से त्रैत वाद का प्रतिपादन किया गया है। इसमें न्याय की परिभाषा के अनुसार न्याय करने की पद्धति तथा उसमें जय-पराजय के कारणों का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। 
चार विभाग :: (1.1). सामान्य ज्ञान की समस्या का निराकरण, (1.2). जगत की समस्या का निराकरण, (1.3). जीवात्मा की मुक्ति एवं (1.4) . परमात्मा का ज्ञान। 
यह एक आस्तिक दर्शन है, जिसमें ईश्वर कर्म-फल प्रदाता है। इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्रमाण है। न्याय दर्शन में आघ्यात्मवाद की अपेक्षा तर्क एवं ज्ञान का आधिक्य है। इसमें तर्क शास्त्र का प्रवेश इसलिए कराया गया, क्योंकि स्पष्ट विचार एवं तर्क-संगत प्रमाण परमानन्द की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
न्याय दर्शन में (1). सामान्य ज्ञान, (2). संसार की क्लिष्टता, (3). जीवात्मा की मुक्ति एवं (4). परमात्मा का ज्ञान। इन चारों गंभीर उद्देश्यों को लक्ष्य बनाकर प्रमाण आदि 16 पदार्थ उनके तार्किक समाधान के माने गये है, किन्तु इन सबमें प्रमाण ही मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। किसी विषय में यथार्थ ज्ञान पर पहुंचने और अपने या दूसरे के अयथार्थ ज्ञान की त्रुटि ज्ञात करना ही, इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य है। दु:ख का अत्यन्तिक नाश ही मोक्ष है।
न्याय दर्शन की अन्तिम दीक्षा यही है कि केवल ईश्वरीयता ही वांछित है, ज्ञातव्य है और प्राप्य है; यह संसार नहीं।
पदार्थ और मोक्ष :: मुक्ति के लिए इन समस्याओं का समाधान आवश्यक है, जो 16 पदार्थों के तत्वज्ञान से होता है। इनमें प्रमाण और प्रमेय भी है। तत्वज्ञान से मिथ्या-ज्ञान का नाश होता है। राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके यही मोक्ष दिलाता है। सोलह पदार्थों का तत्व-ज्ञान मोक्ष का हेतु बनाता है।
दु:खजन्मप्रवृति दोष मिथ्यामानानाम उत्तरोत्तरापाये तदनंन्तरा पायायदपवर्ग:॥ दु:ख, जन्म, प्रवृति (-धर्म, अधर्म), दोष (-राग, द्वेष) और मिथ्या ज्ञान। इनमें से उत्तरोतर नाश द्वारा इसके पूर्व का नाश होने से अपवर्ग अर्थात् मोक्ष होता है।
प्रमेय के तत्व-ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है और प्रमाण आदि पदार्थ उस ज्ञान के साधन है। युक्ति तर्क है जो प्रमाणों की सहायता करता है। पक्ष-प्रतिपक्ष के द्वारा जो अर्थ का निश्चय है, वही निर्णय है। दूसरे अभिप्राय से कहे शब्दों का कुछ और ही अभिप्राय कल्पना करके दूषण देना छल है।
आत्मा का अस्तित्व :: आत्मा, शरीर और इन्द्रियों में केवल आत्मा ही भोगने वाला है। इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख-दु:ख और ज्ञान उसके चिह्म है जिनसे वह शरीर से अलग जाना पड़ता है। उसके भोगने का घर शरीर है। भोगने के साधन इन्द्रिय है। भोगने योग्य विषय (-रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श) रूपी, ये अर्थ हैं। उस भोग का अनुभव बुध्दि है और अनुभव कराने वाला अंत:करण मन है। सुख-दु:ख का कारण कर्म फल है और अत्यान्तिक रूप से उससे छूटना ही मोक्ष है।
नीयते अनेन इति न्यायः॥ न्याय वह साधन-प्रक्रिया है जिसकी सहायता से मनुष्य किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्ध या किसी सिद्धान्त का निराकरण होता है और किसी नतीजे-निर्णय पर पहुँच सकता है। 
न्याय प्रक्रिया में संज्ञान लेने के लिए चार चीजों का होना आवश्यक है :- (1). प्रमाता अर्थात्‌ ज्ञान प्राप्त करने वाला, (2). प्रमेय अर्थात्‌ जिसका ज्ञान प्राप्त करना अभीष्ट है, (3). ज्ञान और (4). प्रमाण अर्थात ज्ञान प्राप्त करने का साधन।
न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ में 5 अध्याय है तथा प्रत्येक अध्याय में दो-दो आह्रिक हैं तथा  कुल सूत्रों की संख्या 539 हैं। इसमें अन्वेषण अर्थात् जाँच-पडद्यताल के उपायों का वर्णन किया गया है। 
सत्य की खोज के लिए सोलह तत्व हैं जिनके द्वारा किसी भी पदार्थ की सत्यता (-वास्तविकता) का पता-परीक्षण किया जा सकता है। (1). प्रमाण, (2). प्रमेय, (3). संशय, (4). प्रयोजन, (5). दृष्टान्त, (6). सिद्धान्त, (7). अवयव, (8). तर्क, (9). निर्णय, (10). वाद, (11). जल्प, (12). वितण्डा, (13).हेत्वाभास, (14). छल, (15). जाति और (16). निग्रह स्थान। इन सबका वर्णन न्याय दर्शन में है और इस प्रकार इस दर्शन शास्त्रको तर्क करने का व्याकरण कह सकते हैं। वेदार्थ जानने में तर्क का विशेष महत्व है। अत: यह दर्शन शास्त्र वेदार्थ करने में सहायक है।
तत्त्वज्ञानान्नि: श्रेयसाधिगम:॥ इन सोलह तत्वों के ज्ञान से निश्रेयस् की प्राप्ति होती है अर्थात सत्य की खोज में सफलता प्राप्ति होती है।
(2). वैशेषिक दर्शन :: महर्षि कणाद द्वारा प्रतिपादित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया है, जो कि मनुष्य योनि को बेहतर और लोकोत्तर बनाने के साथ मोक्ष का साधन हो। दर्शन परिमण्डल, पंच महाभूत और भूतों से बने सब पदार्थों का वर्णन करता है, इसलिए वैशेषिक दर्शन विज्ञान-मूलक है। यह सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेय सिद्धि के साधन को धर्म मानता है। मानव के कल्याण हेतु धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक होता है। इसमें द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष और समवाय इन छ: पदाथों के साधम्र्य तथा वैधम्र्य के तत्वाधान से मोक्ष प्राप्ति मानी जाती है। साधम्र्य (-साम्य, सदृश्य, समानता, समरूपता)  तथा वैधम्र्य (-भेद, व्यतिरेक, विरोध) ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको जाने बिना भ्रांतियों का निराकरण करना संभव नहीं है। इसके अनुसार जिस प्रकार चार पैर होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। उसी प्रकार जीव और ब्रह्म दोनों ही चेतन हैं। किंतु इस साधम्र्य से दोनों एक नहीं हो सकते। साथ ही यह दर्शन वेदों को, ईश्वरोक्त होने को परम प्रमाण मानता है।
यतोम्युदय निश्रेयस सिद्धि: स धर्मः॥ न्याय दर्शन जहाँ अन्तर जगत और ज्ञान की मीमांसा को प्रधानता देता है, वहीं वैशेषिक दर्शन बाह्य जगत की विस्तृत समीक्षा करता है। इसमें आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए इसे अजर, अमर और अविकारी माना गया है।
न्याय और वैशेषिक दोनों ही दर्शन परमाणु (-micro, minutest) से संसार की शुरुआत मानते हैं। इनके अनुसार सृष्टि रचना में परमाणु उपादान कारण और ईश्वर निमित्त कारण है। इसके अनुसार जीवात्मा विभु और नित्य है तथा दुखों का खत्म होना ही मोक्ष (-Liberation, assimilation in Almighty which is grant of bliss, परमानन्द) है।
मूल पदार्थ-परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का वर्णन तो ब्रह्यसूत्र में है। ये तीन पदार्थ ब्रह्य कहलाते हैं। प्रकृति के परिणाम अर्थात् रूपान्तर दो प्रकार के हैं। महत् अहंकार, तन्मात्रा तो अव्यक्त है, इनका वर्णन सांख्य दर्शन में है। परिमण्डल पंच महाभूत तथा महाभूतों से बने चराचर जगत् के सब पदार्थ व्यक्त पदार्थ कहलाते हैं। इनका वर्णन वैशेषिक दर्शन में है।
वैशेषिक दर्शन के प्रथम दो सूत्र हैं :: 
अथातो धर्म व्याख्यास्याम:॥1॥ यतोSभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:॥2॥ 
धर्म :: जिससे इहलौकिक और पारलौकिक (नि:श्रेयस) सुख की सिध्दि होती है, वह धर्म है।
कणाद के वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से भिन्नता इस बात में है कि इसमें 26 के बजाय 7 ही तत्वों का विवेचन है। जिसमें विशेष पर अधिक बल दिया गया है।
वैशेषिक दर्शन बहुत कुछ न्याय दर्शन के समरूप है और इसका लक्ष्य जीवन में सांसारिक वासनाओं को त्याग कर सुख प्राप्त करना और ईश्वर के गंभीर ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा अंतत: मोक्ष प्राप्त करना है। न्याय-दर्शन की तरह वैशेषिक भी प्रश्नोत्तर के रूप में ही लिखा गया है। जगत में पदार्थों की संख्या केवल छह है। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय। क्योंकि इस दर्शन में विशेष पदार्थ सूक्ष्मता से निरूपण किया गया है। इसलिए इसका नाम वैशेषिक दर्शन है।
धर्म विशेष पसूताद द्रव्यगुणकर्म सामान्य विशेष समवायानां।
 पदार्थांना सधम्र्यवैधम्र्याभ्यिं तत्वज्ञानान्नि: श्रेयसम्॥ [वैशेषिक 1-1-8] 
धर्म-विशेष से उत्पन्न हुए पदार्थ यथा, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय-रूप पदार्थों के सम्मिलित और विभक्त धर्मो के अघ्ययन-मनन और तत्व ज्ञान से मोक्ष होता है। ये मोक्ष विश्व की अणुवीय प्रकृति तथा आत्मा से उसकी भिन्नता के अनुभव पर निर्भर कराता है।
वैशेषिक दर्शन में पदार्थों का निरूपण निम्नलिखित रूप से हुआ है :- (1). जल :- यह शीतल स्पर्श वाला पदार्थ है, (2). तेज :- उष्ण स्पर्श वाला गुण है, (3). काल :- सारे कायो की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश में निमित्त होता है, (4). आत्मा :- इसकी पहचान चैतन्य-ज्ञान है, (5). मन :- यह मनुष्य के अभ्यन्तर में सुख-दु:ख आदि के ज्ञान का साधन है, (6). पंच भूत :- पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, (7). पंच इन्द्रिय :- घ्राण, रसना, नेत्र, त्वचा और श्रोत्र, (8). पंच-विषय :- गंध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द, (9). बुध्दि :- ये ज्ञान है और केवल आत्मा का गुण है, (10). ज्ञान  :- नया ज्ञान अनुभव है और पिछला स्मरण, (12). संख्या :- संख्या, परिमाण, पृथकता, संयोग और विभाग ये आदि गुण: सारे गुण द्रव्यों में रहते हैं, (13). अनुभव :- यथार्थ (-प्रेम, विद्या) एवं अयथार्थ, (-अविद्या), (14). स्मृति :- पूर्व के अनुभव के संस्कारों से उत्पन्न ज्ञान, (15). सुख :- इष्ट विषय की प्राप्ति जिसका स्वभाव अनुकूल होता है। अतीत के विषयों के स्मरण एवं भविष्यत में उनके संकल्प से सुख होता है। सुख मनुष्य का परमोद्देश्य होता है, (16). दु:ख: :- इष्ट के जाने या अनिष्ट के आने से होता है जिसकी प्रकृति प्रतिकूल होती है, (17). इच्छा :- किसी अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना ही इच्छ है जो फल या उपाय के हेतु होती है। धर्म, अधर्म या अदृष्ठ: वेद-विहित कर्म जो कर्ता के हित और मोक्ष का साधन होता है, धर्म कहलाता है। अधर्म से अहित और दु:ख होता है जो प्रतिषिद्ध कर्मो से उपजता है। अदृष्ट में धर्म और अधर्म दोनों सम्मिलित रहते हैं।
वैशेषिक दर्शन के मुख्य पदार्थ :: (1). द्रव्य :- द्रव्य गिनती में 9 है।  पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि॥ [विशैषिक 1-1-5]  पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन, (2). गुण :- गुणों की संख्या चौबीस मानी गयी है, जिनमें कुछ सामान्य ओर बाकी विशेष कहलाते हैं। जिन गुणो से द्रव्यों में विखराव न हो उन्हें सामान्य (-संख्या, वेग, आदि) और जिनसे बिखराव (-रूप, बुध्दि, धर्म आदि) उन्हें विशेष गुण कहते है, (3). कर्म :- किसी प्रयोजन को सिद्ध करने में कर्म की आवश्यकता होती है, इसलिए द्रव्य और गुण के साथ कर्म को भी मुख्य पदार्थ कहते हैं। चलना, फेंकना, हिलना आदि सभी कर्म। मनुष्य के कर्म पुण्य-पाप रूप होते हैं। (4). सामान्य :- मनुष्यों में मनुष्यत्व, वृक्षों में वृक्षत्व जाति सामान्य है और ये बहुतों में होती है। दिशा, काल आदि में जाति नहीं होती क्योंकि ये अपने आप में अकेली है। (5). विशेष :- देश काल की भिन्नता के बाद भी एक दूसरे के बीच पदार्थ जो विलक्षणता का भेद होता है वह उस द्रव्य में एक विशेष की उपस्थिति से होता है। उस पहचान या विलक्षण प्रतीति का एक निमित्त होता है :- यथा गौ में गौत्व जाति से, शर्करा में मिठास से, (6). समभाव :- जहाँ गुण व गुणी का संबंध इतना घना है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता एवं (7). अभाव :- इसे भी पदार्थ माना गया है। किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव अथवा किसी एक वस्तु में दूसरी वस्तु के गुणों का अभाव (-ये घट नहीं, पट है) आदि इसके उदाहरण है।
(3). साँख्य :: भगवान् विष्णु के अवतार कपिल मुनि ने साँख्य को प्रतिपादित किया। इसमें सत्कार्यवाद के आधार पर इस सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को माना गया है। इसका प्रमुख सिद्धांत है कि अभाव से भाव या असत् से सत् की उत्पत्ति कदापि संभव नहीं है। सत् कारणों से ही सत् कार्यो की उत्पत्ति हो सकती है। साँख्य प्रकृति से सृष्टि रचना और संहार के क्रम को विशेष रूप से मानता है। साथ ही इसमें प्रकृति के परम सूक्ष्म कारण तथा उसके सहित कार्य पदाथों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। पुरुष तत्व माना गया है, जो प्रकृति का विकार नहीं है। इस प्रकार प्रकृति समस्त कार्य पदाथो का कारण तो है, परंतु प्रकृति का कारण कोई नहीं है, क्योंकि उसकी शाश्वत सत्ता है। पुरुष चेतन तत्व है, तो प्रकृति अचेतन। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है।
विश्व प्रपंच के प्रकृति और पुरुष दो मूल तत्व हैं। विश्व की आत्मायें संख्यातीत है जिसमें चेतना तो है पर गुणों का अभाव है। पुरुष चेतन तत्व है और प्रकृति जड़। (पुरुष से ही प्रकृति की उत्त्पत्ति हुई है, पुरुष गौलोक वासी भगवान् श्री कृष्ण हैं और प्रकृति भगवती माँ राधा जी हैं)। पुरूष में स्वयं आत्मा का भाव है जबकि प्रकृति-जड़ पदार्थ और सृजनात्मक शक्ति की जननी है। जगत का उपादान तत्व प्रकृति है। प्रकृति मात्र तीन गुणो-त्रिगुण सत्व, राजस्व तथा तमस के समन्वय से बनी है। प्रकृति की अविकसित अवस्था में यह गुण निष्क्रिय होते है पर परमात्मा के तेज सृष्टि के उदय की प्रक्रिया प्रारम्भ होते ही प्रकृति के तीन गुणो के बीच का समेकित संतुलन टूट जाता है। जब इन तीनों गुणों की साम्यावस्था भंग हो जाती है और उसके गुणों में क्षोम उत्पन्न होता है तब सृष्टि का आरंभ होता है।
प्रथमतः महतत्त्व, अहंकार और पंच तन्मात्राओं को मिलाकर सात तत्व उत्पन्न होते हैं। अहंकार का गुणों के साथ संयोग होने से ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, मन तथा आकाश इन पाँच महाभूतों की उत्पत्ति होती है।
साँख्य सृष्टि रचना की व्याख्या एवं प्रकृति और पुरूष की पृथक-पृथक व्याख्या करता है। साँख्य सर्वाधिक पौराणिक दर्शन माना जाता है। महाभारत (श्रीमद्भगवद्गीता), पुराणों, उपनिषदों, चरक संहिता और मनु संहिता में साँख्य के विशिष्ट उल्लेख मिलते है। इसके पारंपरिक जन्मदाता भगवान् विष्णु के अवतार कपिल मुनि थे। सांख्य दर्शन में 6  अध्याय और 451 सूत्र है।
साँख्य  के अनुसार 24 मूल तत्व होते है जिसमें प्रकृति और पुरूष पच्चीसवां है। प्रकृति का स्वभाव अन्तर्वर्ती और पुरूष का अर्थ व्यक्ति-आत्मा है। विश्व की आत्माएं संख्यातीत है। ये सभी आत्मायें समान है और विकास की तटस्थ दर्शिकाएं हैं। प्रकृति से लेकर स्थूल-भूत पर्यन्त सारे तत्वों की संख्या की गणना किये जाने से इसे सांख्य दर्शन कहते है। साँख्य, सँख्या का द्योतक है। 
आत्माएँ किसी न किसी रूप में प्रकृति से संबंधित हो जाती है और उनकी मुक्ति इसी में होती है कि प्रकृति से अपने विभेद का अनुभव करे। जब आत्माओं और गुणों के बीच की भिन्नता का गहरा ज्ञान हो जाये तो इनसे मुक्ति मिलती है और मोक्ष संभव होता है।
इस अवस्था को महत् कहते है। यह प्रकृति का प्रथम परिणाम है। मन और बुध्दि इसी महत् से बनते हैं। रजस् गुण शेष रह जाता है। यह तेजस अहंकार कहलाता है। इन अहंकारों को वैदिक भाषा में आप: कहा जाता है। ये (-अहंकार) प्रकृति का दूसरा परिणाम है। तदनन्तर इन अहंकारों से पाँच तन्मात्राएँ (-रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द) पाँच महाभूत बनते है अर्थात् तीनों अहंकार जब एक समूह में आते है तो वे परिमण्डल कहाते है।
भूतादि अहंकार एक स्थान पर (न्यूयादि संख्या में) एकत्रित हो जाते है। दार्शनिक भाषा में इन्हें परिमण्डल कहते हैं। परिमण्डलों के समूह पाँच प्रकार के हैं। इनको महाभूत कहते हैं। (1). पार्थिव, (2). जलीय, (3). वायवीय, (4). आग्नेय एवं (5). आकाशीय। 
अथ त्रिविधदुख: खात्यन्त: निवृत्तिरत्यन्त पुरूषार्थ:॥1॥ 
तीनों प्रकार के दु:खों-आधिभौतिक (-शारीरिक, यह मनुष्य को होने वाली शारीरिक दु:ख है जैसे बीमारी, अपाहिज होना इत्यादि), आधिदैविक (-यह देवी प्रकोपों द्वारा होने वाले दु:ख है जैसे बाढ़, आंधी, तूफान, भूकंप इत्यादि के प्रकोप) एवं आध्यात्मिक (-यह दु:ख सीधे मनुष्य की आत्मा को होते हैं, जैसे कि कोई मनुष्य शारीरिक व दैविक दु:खों के होने पर भी दुखी होता है) से स्थायी एवं निर्मूल रूप से छुटकारा पाने के लिए सर्वोकृष्ट प्रयत्न का वर्णन ग्रन्थ में है।
सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति: प्रकृतेर्महान, महतोSहंकारोSहंकारात् 
पंचतन्मात्राण्युभयमिनिन्द्रियं तन्मात्रेभ्य: स्थूल भूतानि पुरूष इति पंचविंशतिर्गण:॥ 
सत्व, रजस और तमस की साम्यावस्था को प्रकृति कहते है। साम्यावस्था भंग होने पर बनते हैं: महत् तीन अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ, 10 इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत। पच्चीसवां गुण है पुरूष।
(4). योग ::  महर्षि पतंजलि ने इस मार्ग को प्रतिपादित किया। यह दर्शन चार पदों समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद में विभक्त है, जिनके सम्पूर्ण सूत्र संख्या 194 है। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। इसके अलावा योग क्या है, जीव के बंधन का कारण क्या है ? चित्त की वृत्तियां कौन सी हैं ? इसके नियंत्रण के क्या उपाय हैं ? इत्यादि यौगिक क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। जब तक हमारी इंद्रियां बहिर्गामी हैं, तब तक ध्यान कदापि संभव नहीं है। इसके अनुसार परमात्मा के मुख्य नाम ओ३म् का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण ही है। इसमें व्यवहारिक और आध्यात्मिक उपयोगिता सर्वमान्य है क्योकि योग के आसन एवं प्राणायाम का मनुष्य के शरीर एवं उसके प्राणों को बलवान एवं स्वस्थ्य बनाने में सक्षम योगदान रहा है।
अथ योगानुशासनम्॥1॥ :: योग की शिक्षा देना इस समस्त शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय समझना चाहिए।
योगश्चित्तवृत्ति निरोध:॥2॥ :: चित्त या मन की स्मरणात्मक शक्ति की वृत्तियों को सब बुराई से दूर कर, शुभ गुणो में स्थिर करके, पश्रमेश्वर के समीप अनुभव करते हुए मोक्ष प्राप्त करने के प्रयास को योग कहा जाता है।
योग जीवात्मा का सत्य के साथ संयोग अर्थात् सत्य-प्राप्ति का उपाय है। ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है और ज्ञान बुध्दि की श्रेष्ठता से प्राप्त होता है।
एवं बूद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। [भगवद्गीता] :: बुध्दि से परे आत्मा को जानकर, आत्मा के द्वारा आत्मा को वश में करके अपने पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। आत्मा पर नियंत्रण बुध्दि द्वारा, यह योग दर्शन का विषय है।
तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:॥ [योग० 2-1] :: तप (-निरंतर प्रयत्न), स्वाध्याय(अध्यात्म-विद्या का अध्ययन) और परमात्मा के आश्रय से योग का कार्यक्रम हो सकता है।
प्रथम पाद का मुख्य विषय चित्त की विभिन्न वृत्तियों के नियमन से समाधि के द्वारा आत्म साक्षात्कार करना है। 
द्वितीय पाद में पाँच बहिरंग साधन :- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का विवेचन है।
तृतीय पाद में अंतरंग तीन धारणा, ध्यान और समाधि का वर्णन है। इसमें योगाभ्यास के दौरान प्राप्त होने वाली विभिन्न सिद्धियाँ समाधि के मार्ग की बाधाएँ ही हैं।
चतुर्थ कैवल्यपाद मुक्ति की वह परमोच्च-सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ एक योग साधक अपने मूल स्रोत से एकाकार हो जाता है।
योगाश्चित्त वृत्तिनिरोधः। :: योग चित्त की वृत्तियों का संयमन है। चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए महर्षि पतंजलि ने द्वितीय और तृतीय पाद में जिस अष्टांग योग साधन का निम्न उपदेश-संक्षिप्त परिचय :-
(4.1). यम :- कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
(4.2). नियम :- मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तर दोनों ही प्रकार की शुद्धि समाविष्ट है।
(4.3). आसन :- स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है। आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे संबंधित हठयोग प्रतीपिका, घरेण्ड संहिता तथा योगाशिखोपनिषद् में विस्तार से वर्णन मिलता है।
(4.4). प्राणायाम :- योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।
(4.5). प्रत्याहार :- इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।
(4.6). धारणा :- चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
(4.7). ध्यान :- जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो, उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
(4.8). समाधि :- यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।
समाधि की भी दो श्रेणियाँ हैं :- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है। असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।
(5). पूर्व मीमांसा :: पाणिनि के अनुसार मीमांसा अर्थ है, जिज्ञासा-जानने की लालसा। अत: पूर्व-मीमांसा शब्द का अर्थ है जानने की प्रथम जिज्ञासा। इस दर्शन में वैदिक यज्ञों में मंत्रों का विनियोग तथा यज्ञों की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। मनुष्य जब इस संसार में अवतरित हुआ उसकी प्रथम जिज्ञासा यही रही थी कि वह क्या करे?  इस दर्शन-चिंतन शैली का प्रथम सूत्र मनुष्य की इस इच्छा का प्रतीक है। इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनी है। इस ग्रन्थ में 12 अध्याय, 60 पाद और 2,631 सूत्र हैं।
अथातो धर्मजिज्ञासा॥ यदि योग दर्शन अंत: करण शुद्ध का उपाय बताता है, तो मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्ट्रीय जीवन तक के कत्तव्यों और अकत्तव्यों का वर्णन करता है, जिससे समस्त राष्ट्र की उन्नति हो सके। जिस प्रकार संपूर्ण कर्म कांड मंत्रों के विनियोग पर आधारित हैं, उसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी मंत्रों के विनियोग और उसके विधान का समर्थन करता है। धर्म के लिए महर्षि जैमिनि ने वेद को भी परम प्रमाण माना है। उनके अनुसार यज्ञों में मंत्रों के विनियोग, श्रुति, वाक्य, प्रकरण, स्थान एवं समाख्या को मौलिक आधार माना जाता है।
धर्म करणीय कर्म के जानने की जिज्ञासा है। इस जिज्ञासा का उत्तर देने के लिए यह पूर्ण 16 अध्याय वाला ग्रन्थ रचा गया है।
कर्म एक विस्तृत अर्थवाला शब्द है। इसके विषय में 16  अध्याय और 64 पादोंवाला ग्रन्थ लिखना उचित ही था।
यहाँ हम इस ग्रन्थ की झलक मात्र भी देने में असमर्थ हैं। धर्म की व्याख्या यजुर्वेद में की गयी है। वेद के प्रारम्भ में ही यज्ञ की महिमा का वर्णन है। वैदिक परिपाटीमें यज्ञ का अर्थ देव-यज्ञ ही नहीं है, वरन् इसमें मनुष्य के प्रत्येक प्रकार के कायो का समावेश हो जाता है। सभी प्रकार के कर्मों की व्याख्या इस दर्शन शास्त्र में है।
ज्ञान उपलब्धि के जिन छह साधन :- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। मीमांसा दर्शन के अनुसार वेद अपौरूषेय, नित्य एवं सर्वोपरि है और वेद-प्रतिपादित अर्थ को ही धर्म कहा गया है। मीमांसा सिद्धान्त में वक्तव्य के दो विभाग है- पहला है अपरिहार्य विधि जिसमें उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग और अधिकार विधियां शामिल है। दूसरा विभाग है अर्थवाद जिसमें स्तुति और व्याख्या की प्रधानता है।
(6). ब्रह्मसूत्र-उत्तर मीमांसा-वेदांत :: इसके प्रतिपादक महर्षि बादरायण हैं। वेदांत का अर्थ है वेदों का अंतिम सिद्धांत। भगवान् वेद व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। इसको उत्तर मीमांसा भी कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म जगत का कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित्त कारण है। उपादान अथवा अभिन्न कारण नहीं। ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। साथ ही जन्म मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार भी है।
जब मनुष्य जीवन-यापन करने लगता है तो उसके मन में दूसरी जिज्ञासा जो उठती है, वह है ब्रह्म-जिज्ञासा। 
अथातो ब्रह्म जिज्ञासा अर्थात ब्रह्म के जानने की लालसा। इस जिज्ञासा का चित्रण श्वेताश्वर उपनिषद् में बहुत बहुत भली-भाँति किया गया है। ब्रह्मवादिनो वदन्ति :-
किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठा:। अधिष्ठिता: केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्॥ 
ब्रह्म का वर्णन करने वाले कहते हैं,  इस जगत् का कारण क्या हैं ? हम कहाँ से उत्पन्न हुए हैं ? कहाँ और कैसे स्थित हैं ? यह सुख-दु:ख क्यों होता है? ब्रह्म की जिज्ञासा करने वाला यह जानने चाहते हैं। यह सब क्या है, क्यों हैं? इत्यादि।
जिसे जानने की इच्छा है, वह ब्रह्म से भिन्न है, अन्यथा स्वयं को ही जानने की इच्छा कैसे हो सकती है। जीवात्मा अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती रही है। परंतु ब्रह्म का गुण इससे भिन्न है।वेदान्त के अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि सम्प्रदाय समयानुसार विकसित हुए।
पहली जिज्ञासा कर्म धर्म की जिज्ञासा थी और दूसरी जिज्ञासा जगत् का मूल कारण जानने ज्ञान की थी जिसका उत्तर ही ब्रह्मसूत्र अर्थात् उत्तर मीमांसा है। चूँकि यह दर्शन वेद के परम ओर अन्तिम तात्पर्य का दिग्दर्शन कराता है, इसलिए इसे वेदान्त दर्शन के नाम से ही जाना जाता हैं :- वेदस्य अन्त: अन्तिमो भाग ति वेदान्त:॥ यह वेद के अन्तिम ध्येय ओर कार्य क्षेत्र की शिक्षा देता है।
ब्रह्मसूत्र के प्रवर्तक महर्षि बादरायण है। इस दर्शन में चार अध्याय, प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद (-कुल 16  पाद) और सूत्रों की संख्या 555 है। इसमें बताया गया है कि तीन ब्रह्म अर्थात् मूल पदार्थ हैं :- प्रकृति,जीवात्मा और परमात्मा। तीनों अनादि है। इनका आदि-अन्त नहीं। तीनों ब्रह्म कहलाते हैं और जिसमें ये तीनो विद्यमान है अर्थात् जगत् वह परम ब्रह्म है।
प्रकृति जो जगत् का उपादान कारण त्रिट :- तीन शक्तियो-सत्व, राजस् और तमस् का गुट-समूह है। इन तीनो अनादि पदार्थों का वर्णन ब्रह्मसूत्र-उत्तर मीमांसा में है। जीवात्मा का वर्णन करते हुए इसके जन्म-मरण के बन्धन में आने का वर्णन भी ब्रह्मसूत्र में है। साथ ही मरण-जन्म से छुटकारा पाने का भी वर्णन है। परमात्मा जो अपने शब्द रूप में तत्वों से संयुक्त होकर भासता है, परन्तु उसका अपना शुद्ध रूप नेति-नेति शब्दों से ही व्यक्त होता है।यह दर्शन भी वेद के कहे मन्त्रों की व्याख्या में ही है।
वेदांत :- महर्षि वादरायण जो संभवतः वेदव्यास ही हैं, का ब्रह्मसूत्र और उपनिषद वेदांत दर्शन के मूल स्रोत हैं। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्म सूत्र, उपनिषद और श्रीमद्भगवद् गीता पर भाष्य लिख कर अद्वैत मत का जो प्रतिपादन किया उसके प्रभाव इन ग्रन्थों को ही प्रस्थान त्रयी के नाम से जाना जाने लगा। वेदांत दर्शन निर्विकल्प, निरुपाधि और निर्विकार ब्रह्म को ही सत्य मानता है।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या :: जगत की उत्पत्ति ब्रह्म से ही हुई है। 
जन्माद्यस्य यतः।  [ब्रह्म सूत्र-2] उत्पन्न होने के पश्चात जगत ब्रह्म में ही मौजूद रहता है और आखिरकार उसी में लीन हो जाता है। जगत की यथार्थ सत्ता नहीं है। सत्य रूप ब्रह्म के प्रतिबिम्ब के कारण ही जगत सत्य प्रतीत होता है। जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न नहीं है। अविधा से आच्छादित होने पर ही ब्रह्म जीवात्मा बनता है और अविधा का नाश होने पर वह उसमें तद्रूप होता है।
षड दर्शनों के अतिरिक्त अन्य दर्शन-जीवन शैलियाँ :: लोकायत तथा शैव एवं शाक्त दर्शन भी हिन्दू दर्शन के अभिन्न अंग हैं।
चार्वाक दर्शन :: यह मूल रूप से वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदाय के रूप में जाना जाता है। यह भौतिकवाद का प्रतिपादन करता है। बृहस्पति सूत्र के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। Its present versions are Realism, Pragmatism & Materialism. Basically it advocates atheistsism. यह नास्तिकता का प्रतिपादक है।इसके अनुसार अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।
वल्लभाचार्य :: शुद्धाद्वैत अथवा पुष्टिमार्ग
श्रीमद्भागवत में भक्ति के नौ प्रकार :: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवा, अर्चन, वन्दन, दास्य, सखा और आत्मनिवेदन। महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इसमें इसमें दसवीं भक्ति प्रेम लक्षणा भी जोड़ दी गई। यह वल्लभ मत की विशेषता है।
श्री वल्लभाचार्य का जन्म यद्यपि रायपुर जि़ले के चम्पारण्य स्थान पर हुआ था। परन्तु वे मूलतः आन्ध्र प्रदेश के कांकरवाड़ गांव के थे। वे काशी, प्रयाग, मथुरा और ब्रज मण्डल में ही अधिकांश समय रहे। लेकिन इनकी कार्यभूमि उत्तर प्रदेश ही रही। इनके वंश में प्राचीनकाल के सोमयज्ञ का विधान था। अतः इन्हें सौमैया जी के नाम से भी जाना जाता है। इनके जन्म वैषाख कृष्ण पक्ष एकादशी, दिन रविवार सम्वत  1535 अर्थात् सन् 1478 का है। इनके माता-पिता को प्रतिकूल परिस्थितिवश काशी छोड़कर जाना पड़ा। जब भट् दम्पति वर्तमान छत्तीसगढ़ के रायपुर के पास से जा रहे थे तो भट्ट पत्नी इलम्मा को प्रसव पीड़ा हुई। वहीं वन के एकान्त स्थान पर शमी वृक्ष के नीचे इलम्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया। नवजात पुत्र देखने में निष्चेश्ट, निष्प्राण, संज्ञाहीन लग रहा था। अतः उसे मृत समझकर पिता ने उसे वृक्ष की कोटर में रख दिया और अपनी यात्रा जारी रखने का निश्चय किया। थोड़ी देर बाद पिता लक्ष्मण भट्ट की इच्छा पुत्र को देखने की हुई और वे कोटर के पास पहुँचे। वहाँ जाकर देखा तो बालक मंद मंद मुस्कुरा कर खेल मग्न था। उन्होंने तुरन्त अपनी पत्नी को बुलाकर दृष्य दिखाया तो उनकी माता का ममत्व जागा और उन्होंने बालक को उठाकर स्तनपान कराया। अब भट्ट दम्पति ने वापिस काशी लौटने का निश्चय किया। काशी में इनके निवास और सुरक्षा का उत्तरदायित्व इनके शिष्यों और भक्तों ने सम्हाला।
उस काल में निगुर्ण-निराकार इश्वरोपासना के प्रति लोगों का आकर्षण समाप्त प्रायः था। जन साधारण को तलाश थी सगुण साकार भक्ति भाव के मार्ग की। ये चैतन्य महाप्रभु के गुरू भाई थे। अतः दोनों के मतों में काफी समानता है। मूलतः तेलुगु भाषी होते हुए भी इन्होंने हिन्दी और समस्त भाषाओं में ही अपनी रचनाएं की। यह इनके व्यापक दृष्टिकोण का ही प्रभाव था।
शंकराचार्य के मायावाद के विरोध में रामानुज, माध्वाचार्य, निम्बार्क और विष्णु स्वामी के दार्शनिक सिद्धान्त दक्षिण भारत से उत्तर भारत तक फैल चुके थे और वल्लभाचार्य के अर्विभाव काल में इन सब मतवादों का संघर्ष चल रहा था। वल्लभाचार्य निम्बार्क की ही भक्ति परम्परा में राधाकृष्ण भक्ति के प्रमुख प्रचारक थे।
और शुद्धाद्वैत अथवा पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक थे। शुद्धाद्वैत (-शुद्ध+अद्वैत) अर्थात माया के सम्बन्ध से रहित। माया-प्रकृति के सम्बन्ध से रहित ब्रह्म ही जगत का कारण और कार्य है। यही समस्त जगत का उपादान कारण है। ब्रह्मवाद का अर्थ है कि सब कुछ ब्रह्म ही है। जीव और जगत भी ब्रह्म रूप है और दोनो सत्य है। ब्रह्म ने ही रमण करने की या लीला करने की इच्छा से चर और अचर पदार्थों का सृजन किया। शुद्धाद्वैतवाद शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवाद के विरोध में प्रतीत होता है, यद्यपि मूल धारणा में कोई विरोध नहीं है। 
इनकी मान्यता थी कि शंकराचार्य का अद्वैतवाद संसार के प्रति अनासक्ति का भाव तो जगा सकता है, परन्तु ईश्वर के प्रति समर्पित होने के लिए सगुण साकार अवतारी भगवान ही श्रेष्ठ है। इस प्रकार भगवत रूप निराश मनुष्य को एक सुदृढ़ आलम्बन प्रदान करता है। एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति के लिए सगुण साकार रूप अधिक स्वीकार्य है।
"ब्रह्म, सत, चित्त और आनन्द स्वरूप है। वह सर्व व्यापक है, माया रहित और सर्वशक्तिमान है। वह सर्वज्ञ है, स्वतंत्र है और गुणरहित है। उसके अनन्त अवयव हैं, अनन्त रूप हैं, वह अविभक्त और अनादि है। वह निर्गुण होते हुए भी सगुण है। जगत का कर्त्ता और नियन्ता है। उसके प्रात शरीर और गुण नहीं हैं। उसमें आविर्भाव और तिरोभाव की शक्ति है। इसी शक्ति से वह एक में अनेक और अनेक में एक होता रहता है। वह अपने स्वरूप में और अपनी रचित लीला में नित्य मगन रहता है"। [तत्वदीप निबन्ध-तत्वदीप निबन्ध]
शंकराचार्य के मत में एक ब्रह्म ही सत्य है और सब मिथ्या और कल्पना मात्र है। वल्लभाचार्य के मत में जीव और जगत को ब्रह्म का अंग माना गया है। अतः यह सत्य है। इस मत के अनुयायियों की सेवा-भक्ति में भी एक पद्धति है। यह सेवा दो प्रकार की है :– नित्य और नैमेत्तिक। नित्य सेवा, प्रतिदिन सुबह से लेकर रात्रि तक किसी न किसी रूप में चलती रहती है। इसे अष्टयाम सेवा कहते हैं।
नैमेत्तिक सेवा वर्षोंत्सवों के रूप में की जाती है। वर्ष भर में होने वाले पर्वों और उत्सवों के अनुसार विशेष सेवा होती है। अष्टयाम सेवा के आठ सोपान हैं। प्रातःकालीन मंगला, श्रृंगार, गौचारण, राजभोग, उत्थापन, संध्याभोग, संध्या आरती और रात्रिकालीन शयन सेवा ये आठ प्रकार है। ईश्वर भक्ति द्वारा जीव कृपा का अधिकारी होता है और ईश्वर कृपा से ही उसे ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, ये छह गुण प्राप्त होते हैं।
वल्लभ मत के अनुसार जीव दो प्रकार के होते हैं :– एक संसारी जो इस भव चक्र में फंसे हैं। दूसरे मुक्त जो इस चक्र से मुक्त हैं। संसारी अपने इस अज्ञान के कारण दुःख के शिकार हैं। उनका शरीर और इन्द्रियाँ ही उनकी आत्मा हैं। अज्ञान वश वे इस स्थिति में रहते हैं। मुक्त जीव वे हैं, जो अज्ञान या भ्रम को त्याग कर जीवन मुक्त हो चुके हैं। वे भगवत लोक के अधिकारी हैं, वे सत्संगति से भक्ति के विभिन्न मार्गों का अनुसरण करने वाले होते हैं। वल्लभाचार्य कहते हैं :–
‘‘ब्रह्म सत्यं, जगत सत्यं, अंषों जीवोहि नापरः।’’
ब्रह्म सत्य है, जगत सत्य है, जीव भगवान का अंश है, वह परब्रह्म नहीं है। 
Brahm is truth-reality, the world is truth-reality, the organism is a component of the Almighty and is not the Ultimate Par Brahm Parmeshwar.
The concept of truth-reality pertaining to the world as well as the organism is for the house hold-leading a family life. In long term nothing is permanent-stable. All demigods-deities are bound to perish after serving their life span-life cycle. Even the trinity of God: Brahma, Vishnu & Mahesh is deemed to assimilate in the Par Brahm Parmeshwar. They have a life span of 2 Parardh, 4 Parardh & 8 Parardh respectively.
आन्तरिक प्रेरणा से उन्होंने पुष्टि मार्ग की स्थापना की। पुष्टि मार्ग शब्द का बोध उन्हें भागवत पुराण से प्राप्त हुआ। पुष्टि का अर्थ है, भगवान का अनुग्रह अथवा कृपा। यह पुष्टि ही व्यक्ति को इश्वरोन्मुखी बनाती है। पुष्टि भक्ति में मन को केवल भगवत प्राप्ति की ही आकांक्षा रहती है। इसमें जातिगत भेदभाव अथवा धन-ऐश्वर्य का कोई स्थान नहीं। इसमें मुख्य बल मानवात्मा के विकास पर है। पुष्टि मार्ग में आने के लिए आवश्यक है कि साधक लोक और वेद के प्रलोभनों से दूर रहकर उन फलों की आकांक्षा छोड़ दे जो लोक का अनुसरण करने से प्राप्त होते हैं। यह तभी संभव है जब साधक अपने को भगवान के चरणों में समर्पित कर दे। इसी समर्पण से पुष्टि का आरम्भ होता है और पुरुषोत्तम भगवान के स्वरूप के अनुभव होने पर अन्त। पुष्टि मार्ग के उपास्य देव भगवान् श्री कृष्ण हैं।भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति के लिए वल्लभ सम्प्रदाय में दास्य, साँख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव का वर्णन है। इसमें बाल भाव की प्रधानता है। उपसायदेव के प्रति स्नेहपूर्ण शब्दों में कहा गया है ;- 
स्याम सुन नियरो आयो मेहु, भीजेगी मेरी सुरंग चूरनी ओट पीत पट देहुं।
इस सम्प्रदाय में भगवान् श्री कृष्ण के बाल भाव की उपासना की प्रधानता है क्योंकि बालक निष्कपट, सरल और पवित्र होता है। वात्सल्य स्नेह मानव मन का व्यापक भाव है। कृष्ण भक्ति में माँ यशोदा को प्रधानता दी गई है। अपने इष्ट बालक से अपनी भक्ति के बदले में कुछ प्राप्ति की इच्छा नहीं है। जो ज्ञान और योग के मार्ग में लगे हैं, वे लगे रहें, परन्तु साथ-साथ गोपाल की उपासना भी करते रहें। इसमें भी बेहद सुख है। 
माई हो अपनी गोपालहिं गाउँ। सुन्दर स्याम कमलदल लोचन देखि देखि सुख पाउं।
वल्लभाचार्य को श्रीमद् भागवत का ज्ञान जन्मजात था। जब कभी वे भागवत पुराण पढ़ते, उसमें तन्मय होकर अपनी सुधबुध भूल जाते। बालपन में इन्हें भागवत पढ़ते देखकर सभी को ऐसा लगता मानो साक्षात भगवान् श्री कृष्ण अपने बालरूप में अवतरित हो गये हों। इनकी रूचि दर्षन ग्रंथों में भी काफी गहरी थी। इनके पिता इन्हें विद्या विनय सम्पन्न एक अवतारी पुरुष मानते थे। जब ये ग्यारह वर्ष के थे, तब इनके पिता का देहान्त हो गया। बारह वर्ष की आयु में इन्होंने चारों वेद, छहों दर्षन और 18 पुराणों का अध्ययन समाप्त कर लिया था। इसके बाद इन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। घूमते हुए ये दक्षिण में विजय नगर राजा राय कृष्ण देव के दरबार में गए। वहाँ शास्त्रार्थ में उन्होंने दरबार के पण्डितों को पराजित किया। राजा राय कृष्ण देव स्वयं विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने वल्लभाचार्य की विद्वता से प्रभावित होकर इन्हें ‘वैष्णवाचार्य’ के अलंकार से विभूशित किया। शीघ्र ही इनकी ख्याति उज्जैन, काशी तथा अन्य धार्मिक स्थानों पर पहुँची। काशी में इन्होंने महालक्ष्मी नाम की विदुषी कन्या से विवाह किया।
वल्लभाचार्य जी का अन्तिम समय काशी में ही व्यतीत हुआ। इनको एक दिन आभास हुआ कि इनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया है। ये उस दिन प्रातःकाल में वाराणसी के हनुमान घाट पर स्नान करने गए। लोगों ने देखा कि पृथ्वी से एक अलौकिक ज्योति पुंज आसमान की ओर जा रहा है। लाखों लोगों के सामने दिव्य ज्योति आसमान में अर्न्तध्यान हो गई। बाद में पता चला कि आचार्य ने अपना शरीर छोड़ दिया है। यह 1531 की बात है। इस प्रकार इनका जीवनकाल 1478 से 1531 तक,  53 वर्ष का ही था।
इनकी मुख्य रचनाएं व्यास सूत्र भाष्य, जैमिनी सूत्र भाष्य, भागवत टीका सुबोधिनी, पुष्टि प्रवाल मर्यादा और सिद्धान्त रहस्य हैं। ये सभी पुस्तकें संस्कृत में हैं। इन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की। इनमें चतुश्ष्लोकी अत्यंत प्रसिद्ध हुई। वल्लभाचार्य का योगदान न केवल भक्तिभाव में वरन् दार्शनिक, साहित्यिक, सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण है।
साहित्यिक जगत में भागवत की सुबोधिनी टीका और ब्रह्मसूत्रो पर अणु भाष्य उनकी संस्कृत भाषा में अनूठी कृतियां हैं। अष्टछाप की स्थापना कर ब्रज भाषा के आठ कवियों को दीक्षा देकर उन्होंने ब्रज साहित्य की श्री वृद्धि की।
उनका वार्ता साहित्य जैसे "चौरासी वैष्णवों की वार्ता", "दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता" और भागवत की "सुबोधिनी टीका" जन साधारण के लिए है और तत्कालीन समाज संरचना और सामाजिक व्यवहार पर विषद व्याख्या है। इसमें व्यक्ति के लिए उपदेषों पर बल न देकर व्यक्तिगत आचरण सुधार पर बल दिया है। सुबोधिनी टीका में सामाजिक न्याय की अवधारणा को भौतिक रूप में दिया गया है।
‘‘परस्वेति असद्बुद्धि सतां कदापि न भवति। सः सर्वत्र समदृष्टि: स दोशाभावान्न हन्यते।’’
अपने और पराये की भावना सज्जन पुरुषों में नहीं होती। समदृष्टि का भाव मानवता का सर्वोच्च भाव है। जो मनुष्य-मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार की हीन भावना को पनपने नहीं देता।

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